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एक छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोऊ, तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोऊ

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एक छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोऊ, तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोऊ

रघुकुल की महान परम्परा में अयोध्या नगरी में पिता दशरथ और माता कौशल्या के यहा श्रीराम अवतरित हुए।उस समय अयोध्या राज्य में सब और सुख शांति थी।लेकिन सुदूर दक्षिण भारत मे लंकापति रावण आसुरी वृत्तियों को बढ़ाने में लगा था। वह अतिशक्तिमान राक्षसराज धीरे धीरे उतर में भी अपना कुप्रभाव फैलाने में सफल हो रहा था।जिसके चलते भारत के दक्षिण में स्थित अनेक राज्य और उनके निवासी राजा रावण के राक्षसी प्रभाव का शिकार बनते नजर आ रहे थे।ऐसे में प्राचीन भारत की महान संस्कृति का प्रचार और प्रसार करने की जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रभु राम को स्वयं श्रीराम के रूप को स्वयं श्रीराम के रूप में अवतरित होना पड़ा।


भारत के भौगोलिक राज्यो को एकसूत्र में बांधने का अधिकांश श्रेय भगवान राम को ही जाता है।अपने भाई लक्ष्मण और भार्या सीता के साथ 14 बरस उन्होंने लगभग संपूर्ण भारत का भ्रमण किया।जगह जगह सात्विकता को बढ़ावा देते तामसिक वृत्तियों का संहार किया।एक और ऋषि मुनियों का आदर किया तो दूसरी और राक्षसों को दंडित भी किया।ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य समाज के साथ पिछड़े वर्ग के लोगो को साथ लेकर उन्होंने सामाजिक क्रांति की नींव रखी।ठोस उदाहरण देने को तो आदिवासी सरदार गुह नौका खेनेवाला केवट भक्त शबरी वानर जाति के सुग्रीव और अंगद रीछ जाति के जाम्बुवन्त पक्षी जाति के जटायु आदि सब जन के साथ श्रीराम का प्रेमपूर्ण सद्भाव और मैत्री का व्यवहार रहा।ये सब एकजुट होकर श्रीराम के कार्य मे लगे रहे।सीताहरण और उसके चलते उनकी तलाश में जहा राम लक्ष्मण स्वयं वन में पैदल भटके वही इन सब पिछड़ी जाति के सदस्यों ने उनकी निष्काम भाव से सहायता की।राम सेतु और लंका विजय को सामुहिक और सांधिक एकजुटता की विजय का प्रतीक हम मान सकते है।ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन के कुछ पहलुओ का हम अध्ययन कर सकते है

राम ,सीता और लक्ष्मण का वनवास
पिता के वचन का आदर और माता कैकयी की आज्ञा का पालन करने के लिए श्रीराम ने चौदह बरस के वनवास को भी बड़ी सहजता से स्वीकार किया।बन्धुप्रेम से प्रेरित लक्ष्मण और अर्धांगिनी होने के नाते सीता को श्रीराम अपने साथ वन ले गये।वहां एक आदर्श गृहस्थ पति,भाई और गणनायक के रूप में श्रीराम ने जीवन बिताने अपने व्यक्तित्व में चार चांद लगाये।चौदह बरस धर्मपत्नी के सहवास में रहने पर भी वलकधारी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और सीता सन्यास आश्रम का पालन करते हुए शरीर सुख त्याग करते रहे।यह उदात्तता भारतीय संस्कृति को छोड़ शायद ही किसी अन्य संस्कृति में पाई जाती हो।धेयवादी राम अरण्य में भी ऋषिमुनियों के आश्रम को भेंट देने और वेद उपनिषद के गहन तत्वों की चर्चा करते ।इससे वेदों का आध्यात्मिक ज्ञान सारे भारत मे फैला और आर्य संस्कृति का सदुर प्रसार प्रचार हुआ।

रामायण की विश्व यात्रा
भारत के इतिहास में राम जैसा विजेता कोई नही हुआ।उन्होंने रावण और उनके सहयोगी अनेक राक्षसों का वध करके न केवल भारत मे शांति की स्थापन की बल्कि सदुर पूर्व और ऑस्ट्रेलिया तक सुख और आनन्द की तरह व्याप्त कर दी।श्रीराम अद्भुत सामरिक पराक्रम व्यवहार कुशलता और विदेश नीति के स्वामी थे।उन्होंने किसी देश पर अधिकार नही किया।लेकिन विश्व के अनेक देशों में उनकी प्रशंसा के विवरण मिलते है।जिससे पता चलता है कि उनकी लोकप्रियता दूर दूर तक फैली थी।

जावा में रामचंद्र रास्ट्रीय पुरुषोत्तम के रूप मे सम्मानित
वहां की सबसे बड़ी नदी का नाम सरयू है।रामायण के कई प्रसंगों के आधार पर वहां आज भी रात रात भर कठपुतलियों का नाच होता है।जावा के मंदिरों में वाल्मीकि रामायण के श्लोक जगह जगह अंकित मिलते है।सुमात्रा द्वीप को वाल्मीकि रामायण में स्वर्णभूमि नाम दिया गया है।रामायण यहा के जनजीवन में वैसे ही अनुप्राणित है जैसे भारतवासियों के बाली द्वीप भी थाइलैंड जावा और सुमात्रा की तरह आर्य संस्कृति का एक दूरस्थ सीमा स्तम्भ है।रामायण का प्रचार यहा भी घर घर मे है।

कांतिलाल मांडोत

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